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DIWALI



इन दियों के इस त्योहार से परेशान हो रहा हूँ।

घर किस मुँह से जाऊँ, बस यही सोच रहा हूँ।


पछता जरूर रहा हूँ अपनी गलतियों पर।

माँ-पापा की डांट से शायद अभी नहीं समझा हूँ।

रोते हुए इस दिल को बस वही याद दिला रहा हूँ।

घर किस मुँह से जाऊँ, बस यही सोच रहा हूँ।


फटाकों की आवाज़ से अब अभी खुश हो जाता हूँ।

पटाखों की आवाज़ से घर पहुँच जारा हूँ।

बत्तवा देख कर अपना खुद से पूछ रहा हूँ।

घर किस मुँह से जाऊँ, बस यही सोच रहा हूँ।


इस दुनिया की खुशी देख कर खुद से पूछ रहा हूँ।

कहाँ कमी रह गई, बस यही पूछ रहा हूँ।

किसी बुरे काम की इतनी सजा होगी, बस यही दोहरा रहा हूँ।

घर किस मुँह से जाऊँ, बस यही सोच रहा हूँ।


खुद से किए वादों को याद कर रहा हूँ।

कब पूरे होंगे, बस इसी सोच में डूबा हूँ।

पूरे करने के लिए भी माँ-पापा से भगवान की शिकायत कर रहा हूँ।

घर किस मुँह से जाऊँ, बस यही सोच रहा हूँ।


दियों के इस त्योहार को शायद मैं कम समझ रहा हूँ।

अंधेरे में ही साथ देता है, ये भूलता जा रहा हूँ।

मेरा पीछे का ये शैतान कब ख़त्म होगा, यह पूछ रहा हूँ।

घर किस मुँह से जाऊँ, बस यही सोच रहा हूँ।


दिवाली के इस रंग में रंग जाऊँ अब ऐसा सोच रहा हूँ।

शायद नसीब ने कुछ अच्छा लिखा होगा, याद दिला रहा हूँ।

हीरे को भी चमकाने के लिए सहना पड़ता है, ये समझ रहा हूँ।

घर किस मुँह से जाऊँ, बस यही सोच रहा हूँ।


अगली बार दिवाली साथ मनाने की सोच रहा हूँ।

लेकिन बत्तवा मेरा और ख़ुशी माँ-पापा की आँखों में सोच रहा हूँ।

उनके साथ बैठकर घर में सुकून से मस्ती करते हुए खाना चाहता हूँ।

उस दिन लेकिन ये सोचूंगा,

वापस अपने गाँव कब आना होगा, यही सोच रहा हूँ।


--besIk kvI



 
 
 

Comments


BASICKAVI

केहना चाहता था मोहम्मद लेकीन मुकद्दर सुनाई आया,

मुकद्दर हि बोल गया गालिब इम्तिहान नजर आ गया,

इम्तिहान हि क्या सिखाये मुझे जिना ये सुकून,

फिर से मोहम्मद केहने से हि जीतका जाम नजर आ गया.

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-BasicKavi

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